Jogendra Nath Mandal (जोगिंद्र नाथ मंडल): एक विस्मृत लेकिन ऐतिहासिक व्यक्तित्व
14 अप्रैल 2025 को डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती के मौके पर अगर जोगेंद्र नाथ मंडल को याद किया जाए, तो ये ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण और जरूरी होगा। अंबेडकर और मंडल दोनों ने ही भारत के दलित समुदाय के अधिकारों और सामाजिक न्याय की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी — मगर दोनों की राहें अलग थीं।
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Jogendra Nath Mandal (जोगेन्द्र नाथ मंडल) : पाकिस्तान में उपेक्षित – एक दलित हिंदू नेता की दर्दभरी दास्तान
इतिहास में ऐसे कई किरदार होते हैं, जो समय के साथ भुला दिए जाते हैं। जोगेन्द्र नाथ मंडल एक ऐसा ही नाम हैं—जो भारत के दलित समाज के एक मज़बूत स्तंभ थे, पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री बने, लेकिन अंत में पाकिस्तान में ही ‘अछूत‘ और ‘देशद्रोही‘ कहे गए। आइए, जानते हैं इस विस्मृत नायक की असली कहानी।
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Jogendra Nath Mandal (जोगेन्द्र नाथ मंडल) की प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
Jogendra Nath Mandal(जोगिंद्र नाथ मंडल) का जन्म 1904 में बंगाल प्रेसीडेंसी , बाकरगंज (अब बांग्लादेश) के बारिसाल जिले में एक दलित एक गरीब किसान परिवार में हुआ परिवार में हुआ था। वे ‘नामशूद्र‘ जाति से थे, जो उस समय समाज में सबसे निचले पायदान पर माने जाते थे। उनके पिता ने गरीबी के बावजूद उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया। आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों के बावजूद, उन्होंने शिक्षा को अपना हथियार बनाया।उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) चले गए। उन्होंने कानून की पढ़ाई की और वकालत को अपना पेशा चुना। यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की नींव रखी ।
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Jogendra Nath Mandal (जोगेन्द्र नाथ मंडल) का राजनीतिक जीवन और पाकिस्तान का समर्थन
1930 के दशक में Jogendra Nath Mandal (जोगिंद्र नाथ मंडल) दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष करने लगे। वे बंगाल में दलित आंदोलन के प्रमुख नेता बनकर उभरे। 1930 के दशक में, बंगाल में सामाजिक और आर्थिक असमानता चरम पर थी। किसान और मजदूर वर्ग में मुसलमान और दलित बड़ी संख्या में थे। मंडल ने महसूस किया कि कांग्रेस पार्टी में दलितों की बात नहीं सुनी जाती। यही कारण था कि उन्होंने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया, जिनका दावा था कि वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करेंगे। मंडल को विश्वास था कि पाकिस्तान दलितों के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। जब भारत के बंटवारे की बात चल रही थी, तब मंडल ने मुस्लिम लीग का समर्थन किया और मोहम्मद अली जिन्ना के करीबी बन गए। और उन्हें पाकिस्तान की पहली सरकार में कानून और श्रम मंत्री बनाया।
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Jogendra Nath Mandal (जोगिंद्र नाथ मंडल) की ऐतिहासिक भूल (“Blunder”)
मंडल का यह निर्णय कि वे मुस्लिम लीग का समर्थन करें और पाकिस्तान चले जाएं — इतिहासकारों के अनुसार यह उनकी सबसे बड़ी “राजनीतिक भूल” थी। उनका मानना था कि पाकिस्तान में दलितों को बेहतर अधिकार मिलेंगे, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत साबित हुई। पाकिस्तान बनने के बाद वहां हिंदू, विशेष रूप से दलितों, पर भयंकर अत्याचार होने लगे। जब मंडल ने जिन्ना और बाद में लियाकत अली खान से इन अत्याचारों पर सवाल उठाया, तो उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। वे निराश हो गए और उन्हें एहसास हुआ कि पाकिस्तान में दलितों के लिए कोई भविष्य नहीं है। इस्लामी कट्टरपंथ से मोहभंग और इस्तीफा मंडल ने जल्द ही देखा कि पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ वादे निभाए नहीं जा रहे। मंडल खुद कानून मंत्री थे, लेकिन वे अल्पसंख्यकों पर हो रहे ज़ुल्म को रोक नहीं पाए। पाकिस्तान में ‘दार–उल–इस्लाम‘ की विचारधारा हावी होने लगी जब विभाजन के बाद लाखों हिंदुओं की हत्या, अपहरण और धर्मांतरण की खबरें आईं, तो उन्होंने 8 अक्टूबर 1950 को एक लंबा और मार्मिक इस्तीफा पत्र लिखा –
“The naked realities of communalism and religious bigotry have forced me to resign… I can no longer be a silent spectator to the sufferings of my community.”
इस पत्र में उन्होंने पाकिस्तान की नीतियों की कटु आलोचना करते हुए कहा कि “राज्य मज़हब के सामने घुटने टेक चुका है।
- जिन्ना और मंडल: एकअधूरावादा -जिन्ना ने कहा था कि “पाकिस्तान एक ऐसा देश होगा जहां सभी नागरिक बराबर होंगे लेकिन वो वादा अधूरा रह गया।
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Jogendra Nath Mandal(जोगिंद्र नाथ मंडल) की

Dr Ambedkar with Jogendra Nath Mandal Image Credit – Social Media (Amar Ujala) भारत वापसी और राजनीतिक उपेक्षा –
1950 में, Jogendra Nath Mandal (जोगिंद्र नाथ मंडल) ने पाकिस्तान के कानून मंत्री पद से इस्तीफा दिया और भारत लौट आए। उन्होंने एक लंबा पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान में हिंदू, विशेष रूप से दलितों पर हो रहे अत्याचार और अपनी निराशा को विस्तार से व्यक्त किया। यह पत्र आज भी ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में देखा जाता है। भारत लौटने के बाद मंडल को वह राजनीतिक मान्यता नहीं मिली जिसकी वे उम्मीद कर रहे थे। डॉ. अंबेडकर और उनके विचारों से उनके पहले ही मतभेद हो चुके थे, और कांग्रेस पार्टी ने भी उन्हें महत्व नहीं दिया। उन्होंने शेष जीवन गुमनामी में बिताया और 1968 में उनका निधन हो गया। डॉ. अंबेडकर और मंडल, दोनों दलित चेतना के योद्धा थे, लेकिन अंबेडकर ने जहाँ स्थायी और दूरदर्शी बदलाव की राह चुनी, वहीं मंडल की राह एक अधूरे सपने की तरह रह गई। मंडल ने मुस्लिम समाज के साथ गठबंधन कर दलित हिंदुओं लिए समानता की उम्मीद की, लेकिन उनका निर्णय ऐतिहासिक रूप से याँ राजनीतिक चूक , सामाजिक भ्रम, पश्चाताप और ऐतिहासिक भूल (“Blunder”) रहा।
ProBlog Conclusion (निष्कर्ष)
Jogendra Nath Mandal (जोगिंद्र नाथ मंडल) का जीवन इस्लामी कट्टरपंथ पाकिस्तान में दलित हिंदू समाज पर भयंकर अत्याचार का एक जटिल इतिहास का हिस्सा है। उन्होंने दलितों के लिए बहुत कुछ करने की कोशिश की, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों और गलत फैसलों के चलते वे अंततः उपेक्षित हो गए। उनकी कहानी आज भी एक सबक देती है कि आदर्श और यथार्थ के बीच संतुलन कितना ज़रूरी है। उनकी सबसे बड़ी भूल पाकिस्तान जाना नहीं, बल्कि भारत को पूरी तरह न समझ पाना था दलित हिंदू समाज का अभिन्न हिस्सा हैं भारत में दलित हिंदू समाज के पास अधिकार हैं, संघर्ष के रास्ते हैं, और बदलाव की संभावना है। पाकिस्तान में उनके पास न पहचान है, न ही मंच। भारत ही दलितों के लिए सबसे सुरक्षित लोकतांत्रिक ढांचा है। 14 अप्रैल को जब हम अंबेडकर को याद करते हैं, तब मंडल को याद करना हमारी ऐतिहासिक और सामाजिक जिम्मेदारी है — ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ राजनीतिक चूक , सामाजिक भ्रम, पश्चाताप और ऐतिहासिक भूल (“Blunder”) से सबक ले सकें।
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